अज्झवसाणठाणंतराणि जीवो विव्वइ इमो हु ।
णिच्चं पि जहा सरडो गिण्हदि णाणाविहे वण्णे॥1788॥
जैसे गिरगिट सदा बदलता भाँति-भाँति के अपने रंग ।
वैसे अध्यवसाय स्थानों को धारण करता चेतन॥1788॥
अन्वयार्थ : जितने असंख्यातगुणे लोकाकाश के प्रदेश हैं, उतने जीव के कर्मबंध होने योग्य कषायों के और अनुभाग के परिणामों के स्थान हैं । जैसे करकांट्या/गिरगिट अनेक प्रकार के रंग बदलता है, तैसे ही हर समय परिणाम पलटते रहते हैं । इसलिए नवीन-नवीन अध्यवसाय रूप परिणाम होते हैं ।

  सदासुखदासजी