
आगसम्मि वि पक्खी जले वि मच्छा थले वि थलचारी ।
हिंसंति एक्कमेक्कं सव्वत्थ भयं खु संसारे॥1789॥
नभ में पक्षी मगरमच्छ जल में थल में थलचर प्राणी ।
एक दूसरे को मारें इसलिए जगत में भय सर्वत्र॥1789॥
अन्वयार्थ : आकाश में गमन करते हुए पक्षी को तो अन्य पक्षी मारते हैं । जल में गमन करते मत्स्यादि को अन्य जलचर मत्स्यादि मारते हैं । स्थल में विचरते हुए तिर्यंच-मनुष्यों को स्थलचारी दुष्ट तिर्यंच-मनुष्य मारते हैं । एक को एक मारते हैं । इसलिए संसार में सर्वत्र/समस्त स्थानों में निरन्तर भय जानना ।
सदासुखदासजी