पं-सदासुखदासजी
ससउ वाहपरद्धो बिलित्ति णाऊण अजगरस्स मुहं ।
सरणत्ति मण्णमाणो मच्चुस्स मुहं जह अदीदि॥1790॥
ज्यों खरगोश शिकारीभय से अजगर के मुख को बिल जान ।
मृत्यु के मुख में जाता है उसको ही निज शरणा मान॥1790॥
सदासुखदासजी