तह अण्णाणी जीवा परिद्धमाणच्छुहादिबाहेहिं ।
अदिगच्छंति महादुहहेदुं संसारसप्पमुहं॥1791॥
वैसे यह अज्ञानी प्राणी क्षुधा आदि से पीड़ित है ।
बहु दुःखदायक इस संसार सर्प के मुख में जाता है॥1791॥
अन्वयार्थ : जैसे व्याघ्र/शिकारी मनुष्य से पीडित होकर खरगोश दौडता है और अजगर मुख फाडे हुए था, उसे बिल जानकर अपने को शरण मिल गया मानकर मृत्यु के मुख में प्रवेश कर जाता है । तैसे ही अज्ञानी जीव क्षुधा, तृषा, काम, कोपादि से बाधा को प्राप्त हुआ महादु:ख के कारणरूप संसाररूपी सर्प के मुख में प्रवेश कर जाता है । मिथ्यात्व, विषय-कषायों में प्रवेश करता है, वही संसाररूप सर्प का मुख है, संसार में निगोद मुख्य है । उस निगोद को प्राप्त होकर अपने ज्ञान-दर्शन-सुख-सत्तादि भावप्राणों का लोप/नाश करके जडरूप हुआ अनन्तानन्त काल व्यतीत करता है ।

  सदासुखदासजी