
जावदियाइं दुखाइं हवंति लोगम्मि सव्वजीवेसु ।
ताइंपि बहुविधाइं अणंतखुत्तो इमो पत्तो॥1792॥
अरे! लोक की सब योनि में जितने भी दुःख विविध प्रकार ।
उन सब दुःख को यह प्राणी तो भोग चुका है अनन्त बार॥1792॥
अन्वयार्थ : इस लोक में चतुर्गति/सर्व योनियों में जीव को जितने दु:ख होते हैं, उतने प्रकार के बहुत दु:ख अनंत बार इस जीव को प्राप्त हुए हैं । जगत में ऐसे कोई दु:ख बाकी नहीं रहे, जो दु:ख इस संसारी जीव ने नहीं पायेहों ।
सदासुखदासजी