
दुक्खं अणंतखुत्तो पावेत्तु सुहंपि पावदि कहिं वि ।
तह वि य अणंत खुत्तो सव्वाणि सुहाणि पत्ताणि॥1793॥
दुःख अनन्त भोगकर फिर यह किंचित् सुख भी प्राप्त करे ।
तो भी सब सुख भोगे इस प्राणी ने बार-अनन्त अरे॥1793॥
अन्वयार्थ : इस संसार में इस जीव ने अनन्तबार दु:ख पाये, तब फिर कहीं एक बार इन्द्रिय जनित सुख पाया । इस प्रकार अनन्त पर्यायों में अनन्त बार दु:ख पाये, तब कहीं एक बार सुख पाया । ऐसे अनन्त बार विषयाधीन इन्द्रियजनित सुख भी प्राप्त किये, परंतु एक बार सम्यग्दर्शन के धारकों के जो स्थान - गणधरपद, कल्पेन्द्र, लौकान्तिक देवपना, नव अनुदिशवासी देवपना, पंच अनुत्तरों में देवपना तथा तीर्थंकरादि के पद कभी भी नहीं पाये ।
सदासुखदासजी