करणेहिं होदि विगलो बहुसो वचिचित्तसोदणित्तेहिं ।
घाणेण य जिब्भाए चिट्ठाबलविरियजोगेहिं॥1794॥
बहुत बार यह जीव वचन मन श्रोत्र नेत्र अरु प्राण बिना ।
जिह्वा चेष्टा और वीर्य बल बिना विकल-इन्द्रिय होता॥1794॥

  सदासुखदासजी