
जच्चंधबहिरमूओ छादो तिसिओ वणे व एयाई ।
भमइ सुचिरंपि जीवो जम्मवणे णठ्ठसिद्धिपहो॥1795॥
सिद्धि पंथ से भ्रष्ट जीव भव-वन में हुआ कभी जन्मांध ।
मूक बधिर हो भूखा प्यासा एकाकी चिरकाल भ्रमा॥1795॥
अन्वयार्थ : इस संसार में यह जीव बहुत बार वचन, मन, कर्ण, नेत्र, जिह्वा, नासिका, तथा बल-वीर्य - इनके संयोग से रहित अर्थात् विकलेन्द्रिय हुआ । निर्वाण का मार्ग - रत्नत्रय उससे रहित हुआ । यह जीव संसाररूप वन में चिरकाल/अनन्त कालपर्यंत अकेेला जन्म से अंधा हुआ, बहरा हुआ, गूँगा हुआ, क्षुधा-तृषावान हुआ, वन में भ्रमण करे, तैसे भ्रमण किया ।
सदासुखदासजी