एइंदियेसु पंचविधेसु वि उत्थाणवीरियविहूणो ।
भमदि अणंतं कालं दुक्खसहस्साणि पावेतो॥1796॥
एकेन्द्रिय आदिक पाँचों स्थावर में हो वीर्य विहीन ।
काल अनन्त भ्रमे भव-वन में दुःख सहस्र भोगे हो दीन॥1796॥
अन्वयार्थ : तथा पृथ्वीकाय-जलकाय-अग्निकाय-वायुकाय और वनस्पतिकाय स्वरूप पंच प्रकार के एकेन्द्रियों में से त्रसकाय की प्राप्ति हेतु उद्यम तथा उत्थान/उठने इत्यादि की शक्तिविहीन हुआ हजारों दु:खों को प्राप्त होकर अनन्त कालपर्यंत स्थावर काय में भ्रमण करता रहा है ।

  सदासुखदासजी