
बहुदुक्खावत्ताए संसारणदीए पावकलुसाए ।
भमइ वरागो जीवो अण्णाणणिमीलिदो सुचिरं॥1797॥
बहु दुःखरूपी भँवरोंवाली पाप नीर से भरी नदी ।
मोहतिमिर से भ्रमे बिचारा अज्ञानी प्राणी अति दीन॥1797॥
अन्वयार्थ : अनेक प्रकार के शरीरों से उत्पन्न और मन से उत्पन्न हैं दु:ख जिसमें, और पाप से मलिन संसाररूपी नदी में अज्ञानभाव से मुद्रित/बंद हैं ज्ञान-नेत्र जिसके ऐसा वराक/ भिखारी संसारी जीव चिरकाल से भ्रमण कर रहा है ।
सदासुखदासजी