विसयामिसारगाढं कुजोणिणेमि सुहदुक्खदढखीलं ।
अण्णाणंतुबधरिदं कसायदढपट्टयाबंधं॥1798॥
विषय-चाहरूपीदृढ़ आरे कुगति धुरी सुख-दुःख दृढ़ कील ।
अज्ञानरूप तूँबी पर थिर है दृढ़ कषाय पाटे बन्धन॥1798॥

  सदासुखदासजी