बहुजम्मसहस्सविसालवत्तणिं मोहवेगमदिचवलं ।
संसारचक्कमारुहिय भमदि जीवो अणप्पवसो॥1799॥
शत सहस्र जन्मों के पथ पर मोह वेग से दौड़ रहा ।
इस संसारचक्र पर बैठा पराधीन होकर भ्रमता॥1799॥
अन्वयार्थ : ऐसे संसाररूपी चक्र ऊपर चढा हुआ जीव परवश हुआ भ्रमण करता है । कैसा है संसारचक्र? विषयों की अभिलाषा रूप आरों से दृढ है और नरकादि कुयोनि ही जिसमें नेमि/धुरा है, सुख-दु:खरूप जिसमें दृढ कीलें हैं, अज्ञानभावरूपी तुम्बा को धारण कर रखा है, कषायरूपी दृढपट्टिका से बद्ध है, बहुत जन्म के सहस्र रूप विस्तीर्ण जिसका परिभ्रमण का मार्ग है और मोहरूप वेग जिसका अति चंचल है, ऐसे संसाररूप चक्र पर चढा जो जीव उसका निकलना बहुत कठिन है ।

  सदासुखदासजी