
भारं णरो वहंतो कहंचि विस्समदि ओरुहिय भारं ।
देहभरवाहिणो पुण ण लहंति खणं पि विस्समिदुं॥1800॥
बोझ उठाने वाला तो कुछ क्षण कर लेता है आराम ।
देह भार को ढोने वाला कभी न ले पाता विश्राम॥1800॥
अन्वयार्थ : भार को ढोने वाला यह संसारी प्राणी कभी भी विश्राम को प्राप्त नहीं होता और जब औदारिक, वैक्रियक शरीर का भार उतरा, तब भी इसके इनसे अनंतगुणे परमाणुओं के स्कन्धरूप तैजस-कार्माण शरीर का बडा भारी बोझ तो लदा ही रहता है, जिससे आत्मा के केवलज्ञान, अनंत दर्शन, अनन्त सुख, अनन्त वीर्य प्रगट नहीं हो सकते हैं ।
सदासुखदासजी