
कम्माणुभावदुहिदो एवं मोहंधयारगहणम्मि ।
अंधोव दुग्गमग्गे भमदि हु संसारकंतारे॥1801॥
कर्म-चेतना के अनुभव से दुःखी जीव दुर्गम पथ में ।
अन्धे जैसा फिरे भटकता मोह तिमिरमय भव-वन मेंे॥1801॥
अन्वयार्थ : जैसे विषम मार्ग में अन्धा परिभ्रमण करता है, तैसे ही मोह अन्धकार से गहन संसाररूपी वन में कर्म के प्रभाव से दु:खित जीव भ्रमण करता है ।
सदासुखदासजी