दुक्खस्स पडिगरेंतो सुहमिच्छंतो य तह इमो जीवो ।
पाणवधादीदोसे करेइ मोहेण संछण्णो॥1802॥
भव-वन भ्रमता प्राणी दुःख से डरे और सुख को चाहे ।
किन्तु मोह से मूढ़ हुआ हिंसा आदिक बहु दोष करे॥1802॥
अन्वयार्थ : यह संसारी जीव दु:ख से भयाक्रान्त हुआ दु:ख का प्रतीकार/इलाज करके सुख की अभिलाषा करके मोह से आच्छादित हुआ हिंसादि दोषों को ही करता है ।

  सदासुखदासजी