दोसेहिं तेहिं बहुगं कम्मं बंधदि तदो णवं जीवो ।
अध तेण पच्चइ पुणो पविसित्तु व अग्गिमग्गीदो॥1803॥
दोषों से यह जीव बहुत से कर्म बाँधकर फल भोगे ।
पुनः बाँधता कर्म, अग्नि से अन्य अग्नि में जा पहुँचे॥1803॥

  सदासुखदासजी