बंधंतो मुच्चंतो एवं कम्मं पुणो पुणो जीवो ।
सुहकामो बहुदुक्खं संसारमणादियं भमइ॥1804॥
इस प्रकार यह बार-बार कमाब से बँधे और छूटे ।
सुख चाहे पर बहु दुःखमय इस भव-वन में चिरकाल भ्रमे॥1804॥
अन्वयार्थ : उन हिंसादि दोषों से जीव नये-नये बहुत कर्म को ऐसे बाँधता है, जिससे उस कर्म परिपाक के समय में वह जीव बाधा को प्राप्त होता है, जैसे एक अग्नि से निकलकर दूसरी अग्नि में प्रवेश करना, ऐसे ही संसारी जीव कर्म से बारम्बार बँधता है और बारम्बार छूटता है, सुख की इच्छा से बहुत दु:खरूप अनादि संसार में भ्रमण कर रहा है । यहाँ पंच परावर्तन का विशेष रूप से वर्णन ग्रन्थ बढ जाने के भय से नहीं किया है ।

  सदासुखदासजी