+ अब लोकानुप्रेक्षा पन्द्रह गाथाओं में कहते हैं - -
आहिंडयपुरिसस्स व इमस्स णीया तहिं तहिं होंति ।
सव्वे वि इमो पत्ते संबंधे सव्वजीवेहिं॥1805॥
देशान्तर में भ्रमते नर को इष्ट स्वजन सर्वत्र मिलें ।
सब जीवों को इष्ट मित्र सम्बन्धी भी सर्वत्र मिलें॥1805॥
अन्वयार्थ : संसार में समस्त जीवों के साथ सभी संबंधों को अनेक बार प्राप्त हुआ है ।

  सदासुखदासजी