माया वि होइ भज्जा भज्जा मायत्तणं पुणमुवेदि ।
इय संसारे सव्वे पयिहट्टंते हु संबंधी॥1806॥
इस भव की माता ही अगले भव में पत्नी होती है ।
पत्नी भी फिर माता होती सब सम्बन्ध अनित्य कहे॥1806॥
अन्वयार्थ : संसार में समस्त संबंध निरंतर पलटते रहते हैं ।

  सदासुखदासजी