कुलरूवतेयभोगाधिगो वि राया विदेहदेसवदी ।
वच्चघरम्मि सुभोगो जाओ कीडो सकम्मेहिं॥1809॥
था विदेह अधिपति सुभोग कुलरूप तेज में अतिशयवान ।
तो भी अशुभ कर्म के कारण विष्टाघर में कीट हुआ॥1809॥
अन्वयार्थ : कुलवान, रूपवान, तेज का धारक और अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा भोगों की अधिकता ऐसा विदेह देश का स्वामी राजा सुभोग अपने अशुभकर्म के वश से विष्टा घर में कीडा हुआ । इस संसार में पाप-पुण्य का ही समस्त चरित्र है ।

  सदासुखदासजी