
होऊण महढ्ढीउ देवो सुभवण्णगंधरूवधरो ।
कुणिमम्मि वसदि गब्भे धिगत्थु संसारवासस्स॥1810॥
शुभ रूप गन्ध अरु वर्णवन्त ऋद्धिधारी सुर होकर भी ।
मलिन गर्भ में वास करे संसार वास यह है धिक्-धिक्॥1810॥
अन्वयार्थ : शुभवर्ण, शुभगंध, शुभरूप का धारक भी महान ऋद्धि का धारक देव होकर भी आयु के अंत में महामलिन दुर्गंधमय गर्भस्थान में प्रवेश करता है । इसलिए संसार के वास को धिक्कार होओ ।
सदासुखदासजी