इधइं परलोगे वा सत्तू पुरिसस्स हुंति णीया वि ।
इहइं परत्त वा खाइ पुत्तमंसाणि सयमादा॥1811॥
इधइं रिलागिि वा सत्तू िुपरसस्स हुंेत णीया ेव ।
इहइं रित्त वा खाइ िुत्तमंसोण सयमादा॥1811॥
अन्वयार्थ : जो अपने अति नजदीक हैं, वे भी इस लोक में या परलोक में पुरुष/जीव के शत्रु हो जाते हैं । अपनी माता ही इस लोक में या परलोक में अपने पुत्र का मांस खाती है । इसलोक में इसके सिवाय और क्या अनर्थ होगा/क्या आश्चर्य होगा?

  सदासुखदासजी