
होऊण रिऊ बहुदुक्खकारओ बंधवो पुणो होदि ।
इय परिवट्टइ णीयत्तणं च सत्तुत्तणं च जये॥1812॥
अति दुःखदायक शत्रु भी प्रियतम बन्धु हो जाता है ।
अतः मित्रता और शत्रुता परिवर्तित हों इस जग में॥1812॥
अन्वयार्थ : जो पहले बहुत दु:ख देने वाले वैरी होकर भी इसी लोक - भव में स्नेह करने वाले बांधव हो जाते हैं । जगत में इस प्रकार अपनापन और शत्रुपन क्षणमात्र में राग-द्वेष के वश से बदल जाते हैं ।
सदासुखदासजी