
दारिद्दं अढ्ढित्तं णिंदं च थुदिं च वसणमब्भुदयं ।
पावदि बहुसो जीवो पुरिसित्थिणवुं सयत्तं च॥1815॥
हो दरिद्र या धनिक, प्रशंसा-निंदा या सुख-दुःख पावे ।
बहुत बार यह जीव नपुंसक या नर-नारी तन पावे॥1815॥
अन्वयार्थ : संसारी जीव लाभांतराय कर्म के उदय से कभी दरिद्री होता है और लाभांतराय के क्षयोपशम से बहुत धन का धनी होता है । अपनी इच्छा से भी अधिक संपदा प्राप्त होती है । अयशस्कीर्ति नामकर्म के उदय से निंदा को प्राप्त होता है । यशस्कीर्ति नामकर्म के उदय से जगत में उज्ज्वल यश फैलता है । असाता वेदनीयकर्म के उदय से व्यसन, कष्ट, दु:ख को प्राप्त होता है । सातावेदनीय के उदय से देव, मनुष्य गति में सुख को प्राप्त होता है । वेद के उदय से बारंबार पुरुष-स्त्री-नपुंसकपने को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी