
कारी होइ अकारी अप्पडिभोगो जणो हु लोगम्मि ।
कारी वि जणसमक्खं होइ अकारी सपडिभोगो॥1816॥
पुण्यहीन यदि दोष रहित हो किन्तु दोष का भागी हो ।
पुण्यवान यदि दोष करे, पर जग में दोषी सिद्ध न हो॥1816॥
अन्वयार्थ : इस संसार में पुण्यरहित/पाप का उदय हो तो निर्दोष होते हुए भी लोक सदोष मानने लगता है और पुण्य के उदय सहित पुरुष को तो सदोषी होने पर भी लोक उसे प्रत्यक्ष देखते हुए भी निर्दोषी जाहिर करते हैं, मानते हैं ।
सदासुखदासजी