
सरिसीए चंदिगाये कालो वेस्सो पिओ जहा जोण्हो ।
सरिसे वि तहाचारे कोई वेस्सो पिओ कोई॥1817॥
यथा चन्द्रिका है समान पर शुक्ल कृष्ण हों इष्ट-अनिष्ट ।
हो आचार समान किन्तु नर कोई प्रिय कोई अप्रिय॥1817॥
अन्वयार्थ : जैसे एक माह के दो पक्ष, उसमें चंद्रमा की चाँदनी समान है और समान काल ही चंद्रमा का उदय होता है । शुक्ल पक्ष में पहली रात्रि में चंद्रमा उदित रहता है और कृष्णपक्ष में पिछली रात्रि में उदित रहता है । चंद्रमा की कलायें भी समान ही रहती हैं तो भी लोक में कृष्णपक्ष द्वेष करने योग्य सभी को अप्रिय लगता है और शुक्लपक्ष सभी को प्रिय लगता है; वैसे ही आचरण, क्रिया, कार्य, उपकार, अपकार समान करने पर भी कोई सभी को द्वेष करने योग्य अप्रिय लगता है और कोई सभी के राग करने योग्य प्रिय लगता है । अत: पुण्यप ाप के उदय से अपना समस्त कर्त्तव्य काम नहीं आता । कर्म का उपशम होने पर ही समस्त कर्त्तव्य सफल होते हैं ।
सदासुखदासजी