
इय एस लोगधम्मो चिंतिज्जंतो करेइ णिव्वेदं ।
धण्णा ते भयवंता हे मुक्का लोगधम्मादो॥1818॥
इसप्रकार इस लोक दशा के चिन्तन से होता वैराग्य ।
धन्य-धन्य वे यति जन जो हैं इस संसार दशा से मुक्त॥1818॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार इस लोक का स्वभाव चिंतवन करने से जीव को संसार, देह, भोगों से वैराग्य प्राप्त होता है । लोक में वे ज्ञानवान, सामर्थ्यवान धन्य हैं, पूज्य हैं, जो इस लोक के स्वभाव में राग-द्वेष छोडकर अपने आत्मस्वभाव में रमते हैं, रचते हैं ।
सदासुखदासजी