बिज्जू व चंचलं फेणुदुब्बलं वाधिमहियमच्चुहदं ।
णाणी किह पेच्छंतो रमेज्ज दुक्खद्धु दंु लोगं॥1819॥
ेबज्जू व चंचलं फणिुदुब्बलं वोधमेहयमच्चुहदं ।
णाणी ेकह िच्छिंताि रमज्जि दुक्खद्धु दंु लागिं॥1819॥
अन्वयार्थ : यह मनुष्य लोक बिजलीवत् चंचल है, फेन/झाग उसके समान दुर्बल है, व्याधि से मथित है, मृत्यु से ताडित है और दु:ख से आकुलित है । ऐसे इस मनुष्यलोक को देखते हुए ज्ञानीजन इसमें कैसे रमेंगे? इस प्रकार लोक के स्वभाव का चिंतवन पंद्रह गाथाओं में कहा ।

  सदासुखदासजी