
असुहा अत्था कामा य हुंति देहो य सव्वमणुयाणं ।
एओ चेव सुभो णवरि सव्वसोक्खायरो धम्मो॥1820॥
पंचेन्द्रिय के विषय भोग अरु मानव तन है अशुचि स्वरूप ।
सर्व सुखों की खानरूप जो मात्र धर्म ही है शुचिरूप॥1820॥
अन्वयार्थ : इन मनुष्यों के लिये जो धनादि, काम अर्थात् पंच-इन्द्रियों के विषय ये अशुभ हैं, जीव का अकल्याण करने वाले हैं और देह में लालसा वह भी अशुभ है - अनन्तानन्त जन्म-मरण कराने वाली है । केवल यह धर्म ही समस्त सुखों का देने वाला है, यह शुभ है, समस्त कल्याण का बीज है ।
सदासुखदासजी