
इहलोगियपर लोगियदोसे पुरिसस्स आवहइ णिच्चं ।
अत्थो अणत्थमूलं महाभयं मुत्तिपडिपंथो॥1821॥
सब अनर्थ का मूल अर्थ है मुक्तिमार्ग में विघ्न-स्वरूप ।
महा भयानक इस भव पर-भव में उत्पादक दोष स्वरूप॥1821॥
अन्वयार्थ : इस संसार में यह धन है, वह इस लोक संबंधी काम, क्रोध, मद, मोह, अभिमान, भय, मायाचारी, ईर्ष्या, बहुत आरम्भ, बहुत परिग्रह, हिंसादि समस्त दोषों को प्राप्त कराता है । सभी कामादि, भयादि सब कुछ धन से ही होते हैं । इसलिए यह धन इस लोक संबंधी दोषों को नित्य - सदा ही प्राप्त कराता है और परलोक में दुर्गति को प्राप्त कराता है, पाता है । अत: अर्थ/धन महा अनर्थ का मूल है । वैर, कलह, दुर्ध्यान, ममता, धन से ही बढते हैं । महा भय का कारण है और मुक्ति की दृढ अर्गला है । इसलिए तीव्र राग को बढाने वाला धन है । उसके लिए मुक्ति अति दूर वर्तती है । मुक्ति तो वीतरागता से प्राप्त होती है ।
सदासुखदासजी