
कुणिमकुडिभवा लहुगत्तकारयाअप्पकालिया कामा ।
उवधो लोए दुक्खावहा य ण य हुंति ते सुलहा॥1822॥
अशुचि काय कुटि में होता है निन्दनीय यह नश्वर काय ।
उभय लोक में दुःखदायक है सुलभ नहीं होता यह काय॥1822॥
अन्वयार्थ : काम-विषय हैं, ये सडी हुई दुर्गन्धमय देहरूपी कुटी से उत्पन्न हुए हैं और जगत में हीनता करने वाले, अल्प समय ही रहते हैं, दोनों लोक में दु:ख के देने वाले हैं, फिर भी ये भोग सुलभ नहीं हैं ।
सदासुखदासजी