
इंगालो धोव्वंतो ण सुद्धिमुवयादि जह जलादीहिं ।
तह देहो धोव्वंतो ण जाइ सुद्धिं जलादीहिं॥1824॥
विपुल नीर से धोने पर भी कभी कोयला श्वेत न हो ।
इसी तरह जल आदिक से धोने पर भी तन शुद्ध न हो॥1824॥
अन्वयार्थ : जैसे कोयले को जलादि से धोने पर भी शुद्ध नहीं होता है, अपना कालापन नहीं छोडता, तैसे ही जलादि से प्रक्षालन - धोने पर भी देह शुद्धता - शुचिता को प्राप्त नहीं होती ।
सदासुखदासजी