सलिलादीणि अमेज्झं कुणइ अमेज्झाणि ण दु जलादीणि ।
मेज्झममेज्झं कुव्वंति सयमवि मेज्झाणि संताणि॥1825॥
स्वयं मलिन यह देह जलादिक निर्मल को भी करे मलिन ।
निर्मल नीर स्वयं मैला हो, किन्तु न निर्मल करता तन॥1825॥
अन्वयार्थ : अमेध्य अर्थात् महा अपवित्र शरीर जलादि को अशुद्ध करता है तथा जलादि अपवित्र शरीर को पवित्र नहीं करते ।

  सदासुखदासजी