
तारिसयममेज्झमयं सरीरयं किह जलादिजोगेण ।
मेज्झं हवेज्ज मेज्झं ण हु होदि अमेज्झमयघडओ॥1826॥
तापरसयममज्झिमयं सरीरयं ेकह जलोदजागिणि ।
मज्झिं हवज्जि मज्झिं ण हु हािेद अमज्झिमयघडआि॥1826॥
अन्वयार्थ : ऐसा अशुचिमय शरीर जलादि द्वारा धोने से कैसे पवित्र होगा? कदापि नहीं होगा । जैसे मल का घडा जलादि से शुद्ध नहीं होता, तैसे ही मलमय, हाड, चाम, मांस, रुधिर, मल, मूत्रादिमय शरीर जलादि से शुद्ध नहीं होता है ।
सदासुखदासजी