
णवरि हु धम्मो मेज्झोधम्मत्थस्स वि णमंति देवा वि ।
धम्मेण चेव जादि खु साहू जल्लोसधादीया॥1827॥
मात्र धर्म ही है पवित्र, धर्मात्मा को भी देव नमें ।
जल्लौषधि ऋद्धि पाते हैं मुनिजन मात्र धर्म से ही॥1827॥
अन्वयार्थ : केवल एक धर्म ही पवित्र है, धर्म से युक्त को या धर्म में प्रवर्तते जीव को देव भी नमस्कार करते हैं और धर्म के कारण ही साधुजनों को जल्लौषधादि ऋद्धि प्रगट होती हैं ।
सदासुखदासजी