संसारसागरे से कम्मजलमसंवुडस्स आसवदि ।
आसवणीणावाए जह सलिलं उदधिमज्झम्मि ॥1829॥
ज्यों सागर में छिद्र सहित नौका में पानी आता है ।
भव-सागर में असंवृत्त को कर्म-नीर का आस्रव है॥1829॥
अन्वयार्थ : जैसे समुद्र के बीच छिद्ररहित फूटी नाव में जल प्रवेश करता है, तैसे ही संसार- समुद्र में संवररहित पुरुष के कर्मरूपी जल प्रवेश करता है ।

  सदासुखदासजी