
धूली णेहुत्तुप्पिदगत्ते लग्गा मलो जधा होदि ।
मिच्छत्तादिसिणेहोल्लिदस्स कम्मं तधा होदि॥1830॥
जैसे धूल चिपक जाती है तेल लगे चिकने तन में ।
मिथ्यात्वादिक तेल युक्त जीवों को कर्म चिपकते हैं॥1830॥
अन्वयार्थ : जैसे चिकनाई सहित शरीर में लगी हुई धूल वह मैल होता है, तैसे ही मिथ्यात्व, असंयम, कषायरूप चिकनाई सहित आत्मा को कर्मरूप होने योेग्य जो पुद्गल द्रव्य उन कर्म का बंध होता है ।
सदासुखदासजी