+ अब कर्म होने के योग्य पुद्गल द्रव्य समस्त लोक में भरे हैं, ऐसा दिखाते हैं - -
ओगाढगाढणिचिदो पुग्गलदव्वेहिं सवव्दो लोगो ।
सुहमेहिं बादरेहिं य दिस्सादिस्सेहिं य तहेव॥1831॥
सूक्ष्म और स्थूल तथा नेत्रों से दिखने योग्य-अयोग्य ।
पुद्गल द्रव्यों से भरपूर ठसाठस है यह जग सर्वत्र॥1831॥
अन्वयार्थ : यह तीन सौ तेतालीस घनराजू प्रमाण सम्पूर्ण लोक दृश्य और अदृश्य ऐसे सूक्ष्म-बादर पुद्गल द्रव्यों से नीचे-ऊपर-मध्य में अत्यन्त गाढागाढ/ठसाठस भरा है । पुद्गल द्रव्य बिना लोकाकाश का एक प्रदेश भी नहीं है । उनके कर्मरूप होने योग्य भी अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु भरे हैं । जैसे जल में पडा गर्म लोहे का गोला सर्व ओर से जल को खींचता है, तैसे ही मिथ्यात्व-कषायादि से तप्तायमान संसारी आत्मा सर्व ओर से कर्म के योग्य पुद्गलों का ग्रहण करता है । ऐसे समय-समय में समयप्रबद्ध ग्रहण करता है । पश्चात् जैसे एकबार ग्रहण किया गया आहार रुधिर, मांस, मल, मूत्र, अस्थि, चाम, केशादि अनेकरूप परिणमता है, तैसे ही एकबार ग्रहण की गयी समयप्रबद्धरूप कार्माणवर्गणायें ज्ञानावरणादि अष्ट प्रकार रूप परिणमती हैं ।

  सदासुखदासजी