+ अब मिथ्यात्वादि को कहते हैं - -
मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य आसवा होंति ।
अरहंतवुत्तअत्थेसु विमोहो होइ मिच्छत्तं॥1832॥
मिथ्यादर्शन और अविरमण कषाय योग ये आस्रव हैं ।
अर्हन्त कथित तत्त्वाथाब से विपरीत दृष्टि मिथ्यादृग् है॥1832॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्व, अविरत, कषाय और योग - ये आस्रव हैं । कर्मवर्गणा के आने के द्वाररूप - मिथ्यात्व 5, अविरत 12, कषाय 25, योग 15 - ये सत्तावन आस्रव हैं - कर्म आने के द्वार हैं । उनमें जो अरहन्त भगवान के द्वारा कहे गये सप्त तत्त्वादि अर्थ में विमोह/ अश्रद्धान, वह मिथ्यात्व है ।

  सदासुखदासजी