+ अब राग-द्वेष का माहात्म्य दिखाते हैं - -
किहदा राओ रंजेदि णरं कुणिमे वि जाणुगं देहे ।
किहदा दोसो वेसं खणेण णीयंपि कुणइ णरं॥1834॥
तन को अशुचि जानकर भी उसमें रंजित होना है राग ।
क्षण भर में ही इष्ट जनों का तिरस्कार करना है द्वेष॥1834॥
अन्वयार्थ : अशुचि और अनुराग के अयोग्य यह देह होने पर भी इसमें ज्ञाता मनुष्य को यह रागभाव कैसे रंजायमान करता है ? अशुचि, असार देह में अज्ञानी रंजायमान होता है । ज्ञानी होकर, मलिन, विनाशीक, कृतघ्नी देह में रंजायमान हो, यह बडा आश्चर्य है! इसलिए जगत के जीवों को अपना स्वरूप भुलाने में रागभाव बहुत प्रबल है और राग-द्वेष की प्रबलता ऐसी है कि जो अपना निज बांधव हो, उसे भी क्षणमात्र में द्वेष करने योग्य कर देता है । अत: राग-द्वेष ही जगत को विपरीत मार्ग में प्रवर्तन कराता है ।

  सदासुखदासजी