
सम्मादिट्ठी वि णरो जेसिं दोसेण कुणइ पावाणि ।
धित्तेसि गारविंदियसण्णामयरागदोसाणं॥1835॥
जिन दोषों के कारण सम्यग्दृष्टि जन भी करते पाप ।
उन विषयों, गारव, संज्ञा, मद, राग-द्वेष को हो धिक्कार॥1835॥
अन्वयार्थ : जिन दोषों से सम्यग्दृष्टि भी पापों में प्रवृत्ति करे - ऐसे गारव, इन्द्रिय, संज्ञा, मद, राग, द्वेषों को धिक्कार हो; ऋद्धिगारव, रसगारव, सातगारव - ये तीन प्रकार के गारव हैं । मेरे समान ऋद्धि-संपदा किसके है ? मैं ऋद्धि-संपदा से अधिक हूँ, इस प्रकार ऋद्धि से अपने को बडा मानना, यह ऋद्धिगारव है॥1॥ छहरस सहित भोजन मिलने का अभिमान, मैं कहीं रंकपुरुष के समान नहीं हूँ, मेरा ऐसा पुण्य है कि अनेक प्रकार के रसयुक्त भोजन हाजिर रखे हैं । कौन ग्रहण करे, किसे खाने को मिलते हैं ? किसे देखने मिलते हैं ? ऐसा रसगारव है॥2॥ साता का उदय होते ही अभिमान करता है कि मेरा पुण्य का उदय है, मुझे हानि, वियोग, रोग, दु:ख नहीं होता, कोई पापी के होगा, मैं क्या पापी हूँ । मुझे दु:ख कभी भी नहीं होगा, मुझे भरोसा है । इस प्रकार सात कर्म के उदय से सुख रहता है तो उसका अभिमान वह सातगारव है॥3॥ और अपने-अपने विषयों में लंपटता चाहना, वह पंच इन्द्रियाँ हैं॥5॥ भोजन की अभिलाषा, वह आहार संज्ञा है॥1॥ भय के भाव से छिप जाना, कहाँ जाऊँ ? कौन मेरी रक्षा करेगा ? क्या होगा ? ऐसा कायरपना, वह भयसंज्ञा है॥2॥ काम की आतुरता से मैथुन की अभिलाषा, वह मैथुन संज्ञा है॥3॥ परिग्रह की अभिलाषा, वह परिग्रहसंज्ञा है॥4॥ ऐसा ही गोम्मटसार ग्रंथ में संज्ञाओं का लक्षण और संज्ञाओं की उत्पत्ति के बहिरंग कारणों को कहा है ।
सदासुखदासजी