
जो अभिलासो विसएसु तेण ण य पावए सुहं पुरिसो ।
पावदि य कम्मबंधं पुरिसो विसयाभिलासेण॥1836॥
विषयों की अभिलाषा होने से नर सुख नहिं पाता है ।
और विषय की चाह निमित्त से कर्मबन्ध नर करता है॥1836॥
अन्वयार्थ : जिस जीव को पंच इन्द्रियों के विषयों में अभिलाषा है, उससे उसे सुख प्राप्त नहीं होता । विषयों की अभिलाषा से आत्मा कर्मबंध को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी