कोई डहिज्ज जह चंदणं णरो दारुगं च बहुमोल्लं ।
णासेइ मणुस्सभवं पुरिसो तह विसयलोहेण॥1837॥
राख हेतु चन्दन की लकड़ी कोई मूर्ख जला डाले ।
तुच्छ विषय के हेतु मूढ़ नर दुर्लभ नरभव नष्ट करे॥1837॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई मनुष्य बहुमूल्य चन्दन को राख के लिए जलाता है, तैसे ही यह जीव विषयों के लोभ से निर्वाण का कारणभूत मनुष्यभव, उसका नाश करता है ।

  सदासुखदासजी