
धुट्टिय रयणाणि जहा रयणद्दीवा हरेज्ज कठ्ठाणि ।
माणुसभवे वि धुट्टिय धम्मं भोगे भिलसदि तहा॥1838॥
रत्न-द्वीप में जाकर भी कोई नर लकड़ी ले आए ।
नरभव रत्नद्वीप में आकर धर्म-रत्न तज भोग भजे॥1838॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुरुष रत्नद्वीप में जाकर भी रत्नों को छोडकर रत्नद्वीप से काष्ठ ग्रहण करता है, तैसे ही यह मनुष्यभव में धर्म को त्यागकर भोगों की अभिलाषा करता है । भावार्थ - जैसे रत्नद्वीप को प्राप्त करके भी कोई रत्नों को छोडकर काष्ठ का भार बाँधता है, तैसे ही मनुष्यभव में धर्म को त्यागकर भोगों की अभिलाषा करता है ।
सदासुखदासजी