गंतूण णंदणवणं अमयं छंडिय विसं जहा पियइ ।
माणुशसभवे वि छड्डिय धम्मं भोगे भिलसदि तहा ॥1839॥
नन्दन वन में जाकर भी अमृत तजकर विष पान करे ।
नरभव पाकर धर्मामृत तज मूढ़ विषय-विष पान करे॥1839॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुण्यहीन पुरुष नन्दनवन में जा करके अमृत का त्याग करके विष पीता है, तैसे ही मूढजन मनुष्यभव में धर्म को छोडकर भोगों की वांछा करते हैं ।

  सदासुखदासजी