
पावपओगा मणवचिकाया कम्मासवं पकुव्वंति ।
भुज्जंतो दुब्भत्तं वणम्मि जह आसवं कुणइ॥1840॥
ज्यों दूषित भोजन करने से पीप घाव में हो उत्पन्न ।
त्यों मन-वच-तन पाप प्रवृत्ति से कमाब का हो बन्धन॥1840॥
अन्वयार्थ : पापों में युक्त जो मन-वचन-काय रूप योग, वह कर्म का आस्रव करता है । जैसे खोटे आहार का भोजन करने वाला पुरुष अपने व्रण/घाव में राधि रुधिर का आस्रव करता है ।
सदासुखदासजी