अणुकंपासुद्धवओगो वि य पुण्णस्स आसवदुवारं ।
तं विवरीदं आसवदारं पावस्स कम्मस्स॥1841॥
पुण्यास्रव के द्वार कहे हैं अनुकम्पा अरु शुद्ध प्रयोग ।
पापास्रव का द्वार जानिये अदयाभाव अशुद्ध प्रयोग॥1841॥
अन्वयार्थ : अनुकम्पा/जीवदया और शुभोपयोग - ये पुण्य के आने के द्वार हैं और जीवों में निर्दयता और अशुभोपयोग - ये पापकर्म के आस्रव के द्वार हैं । जिसके दर्शन-चारित्र मोहनीय के विशिष्ट क्षयोपशम से उत्पन्न शुभराग, उससे परम भट्टारक महादेवाधिदेव परमेश्वर अर्हंत- सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधुजनों के गुणों के श्रद्धान में तथा सर्वज्ञ की आज्ञा में प्रवर्तता उपयोग तथा समस्त जीवों की दया में प्रवर्तता उपयोग, वह शुभोपयोग है । वह पुण्य आस्रव का कारण है तथा दर्शन-चारित्रमोहनीय के विशिष्ट उदय से उत्पन्न जो अशुभराग, उससे परम भट्टारक देवाधिदेव परमेश्वर अर्हंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधुओं से भिन्न उन्मार्गियों के गुणों में, उपदेश में प्रवर्तने वाला उपयोग, वह अशुभोपयोग है तथा विषयों के सेवन में, कषायरूप होने में, दुष्ट शास्त्र अर्थात् जो हिंसा के प्ररूपक शास्त्रों के श्रवण में, दुष्टों की संगति में, दुष्टों के आश्रय, दुष्टों के सेवन में, उत्कट आचरण करने में प्रवृत्ति को प्राप्त हुआ जो उपयोग, वह अशुभोपयोग है । ये पाप आस्रव के कारण हैं । यहाँ विशेष ऐसा जानना - शुभोपयोग पुण्यास्रव का कारण है, अशुभ मनो-वचनकाय के योग पापास्रव के कारण हैं । प्राणियों की हिंसा, पर के द्वारा बिना दिये धन का ग्रहण करना, मैथुन सेवनादि - ये अशुभ काययोग हैं । असत्य भाषण, कठोर वचन, धर्मविरुद्ध वचन - ये अशुभ वचनयोग हैं । परजीवों के घात का चिंतवन करना, ईर्ष्याभाव, अदेखसका भाव - ये अशुभ मनोयोग हैं । वे पापास्रव करते हैं । अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्यादि शुभकाययोग हैं । सत्य, हित, मित वचन बोलना, वह शुभ वचनयोग है । अरहन्तादि की भक्ति, तपश्चरण में रुचि, श्रुत का विनयादि, यह शुभ मनोयोग है । ये शुभयोग पुण्यास्रव के कारण हैं । ज्ञानावरणादि अष्टकर्म के आस्रव के कारणों को कहते हैं - मोक्ष का मूल साधन जो मत्यादिज्ञान की कोई प्रशंसा करे, वह अंतरंग में बुरी लगे, सुहावे नहीं, वह प्रदोष है अथवा तत्त्व ज्ञान की कथनी में हर्ष का अभाव, वह प्रदोष है । कोई कारण से कोई सम्यग्ज्ञान की कथनी/बात पूछे, उससे कहे कि मैं नहीं जानता या ऐसा नहीं है, ऐसे सम्यग्ज्ञान को छिपाना, वह निःव है । अथवा अपना गुरु अप्रसिद्ध है, उन्हें छिपाकर प्रसिद्ध गुरु का नाम प्रगट करना, वह निःव है । आपने सम्यग्ज्ञान का अभ्यास किया है, वह ज्ञान योग्य शिष्य को न देना/ न सिखाना, वह मात्सर्य है । कोई धर्मानुरागी ज्ञान का अभ्यास करते हों, उनका व्यवच्छेद कर देना, स्थान बिगाड देना, पुस्तक का संयोग बिगाड देना, पढाने वाले का संबंध बिगाड देना, वह अन्तराय है । पर के द्वारा प्रकाशित ज्ञान को काय से, वचन से वर्जन करना, वह आसादना है । अपनी बुद्धि की दुष्टता से प्रशंसायोग्य ज्ञान को दूषण लगाना, वह उपघात है । ये सभी प्रदोष, निःव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादना, उपघातरूप परिणाम ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म के आस्रव के कारण हैं । आचार्य जो संघ के स्वामी और उपाध्याय जो ज्ञानाभ्यास कराने के अधिकारी, उनके प्रतिकूल रहना, अपूठा/विपरीत रहना, अकाल में अध्ययन करना तथा जिनेन्द्र के वचनों का श्रद्धान नहीं करना, शास्त्राभ्यास में आलसी रहना, अनादर से शास्त्रार्थ का श्रवण करना, धर्मतीर्थ को रोकना, अपने बहुश्रुतपने का गर्व करना, मिथ्यात्व का उपदेश देना, बहुश्रुतों का अपमान करना, अपने पक्ष के ग्रहण में पंडितपना, अपने पक्ष का परित्याग करना, बिना संबंध/ कारण प्रलाप करना, सूत्रविरुद्ध वाद करना, शास्त्रों का बेचना, प्राणीहिंसादि - ये सभी ज्ञानावरण कर्म के आस्रव के कारण हैं । पर को देखने में मत्सरता और देखने में अन्तराय करना, पर के नेत्र उखाडना, पर की इन्द्रियों से वैर करना, नेत्रों को बडा करना/फाडना, बहुत दीर्घ समय तक सोना, दिन में निद्रा लेना, आलस्य करना, नास्तिकता का ग्रहण करना, सम्यग्दृष्टियों को दूषण लगाना, कुतीर्थ जो खोटे तीर्थ की प्रशंसा करना, प्रणियों का घात करना, यतिजनों से ग्लानि करना - ये सभी दर्शनावरण कर्म के आस्रव के कारण हैं । वेदनीयकर्म के आस्रव के कारण कहते हैं - अनिष्ट वस्तु/अपने विरोधी द्रव्य का समागम और वांछित का वियोग, अनिष्ट कठोर वचन के श्रवणादि का बाह्य कारण की अपेक्षा से और असातावेदनीय के उदय से उत्पन्न पीडारूप परिणाम, वह दु:ख है । अपने उपकारक बांधव-मित्रादि के संबंध का अभाव होते ही उनका बारम्बार चिंतवन करने वाले पुरुष के अभ्यंतर मोहनीय कर्म का भेद जो शोक, उसके उदय से चिंता-खेद लक्षणरूप मलिन परिणाम का होना, वह शोक है । कठोर वचन के श्रवण से तथा अपवाद-तिरस्कारादि के होने से अन्त:करण में मलिन होकर तीव्र पश्चात्ताप करना, वह ताप हैऔर परिताप होने से अश्रुपात करना, प्रचुर विलाप करना, अंग विकारादि प्रगट करते हुए शब्द बोलते हुए रुदन करना, वह आक्रन्दन है । आयु, इन्द्रिय, बल, श्वासोच्छ्वास रूप प्राणों का वियोग करना, वह वध है । संक्लेश परिणाम से ऐसा रुदन विलाप करे कि जिसके सुनने से अन्य जीवों के परिणाम काँपने लग जायें, दया उत्पन्न हो जाये, वह परिदेवन है । ये दु:ख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध, परिवेदनरूप परिणाम क्रोधादि से स्वयं करे और स्वयं समर्थ हो तो कषाय के वश से अन्य जीवों को करावे और स्व-पर दोनों को करे-करावे, इससे असातावेदनीय कर्म का आस्रव होता है । दु:खरूप शब्दों से और भी असातावेदनीय के कारणों को कहते हैं । अशुभ प्रयोग करना, पर का अपवाद-निंदा करना, पीठ पीछे पर के दोष कहना, दया का अभाव करना/ होना, पर जीवों को ताप उपजाना, अंग-उपांगों का छेदन करना, भेदन करना, लाठी-मुक्कों से ताडना देना, त्रास उत्पन्न करना, तर्जना करना, छेदन करना, छीलना, काटना, बाँधना, रोकना, मर्दन करना, दमन करना, बहुत दूर तक चलाना, फेंकना, पर की निंदा करना, अपनी प्रशंसा करना, संक्लेश प्रगट करना, निर्दयतापूर्वक प्राणियों का नाश करना, महान आरंभ करना, महान परिग्रह बढाना, विश्वासघात करना, वक्रस्वभाव रखना, पापकर्म द्वारा आजीविका करना, अनर्थदंड ग्रहण करना, विष मिलाना, जीवों को मारने को, पकडने को जाल, फाँसी या गुरा, पींजरा, यंत्र इत्यादि उपाय रचना, खोटे शास्त्र देना, पाप के भाव करना - ये सभी अपने और पराये दोनों के लिए किया हुआ, असातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं । अब सातावेदनीय के आस्रव के कारणों को कहते हैं । भूत अर्थात् समस्त प्राणी और व्रती जो हिंसादिक पापों के त्यागी, उन पर अनुकंपा करना । अनुग्रह बुद्धि से भींजा हुआ, पर की पीडा देखकर अपने को पीडा हो रही हो - ऐसा जानकर कंपायमान होना, वह अनुकम्पा है । जिसे दया है, वह अपने समान समस्त प्राणियों का दु:ख देखकर काँपता है और महाव्रतीअणुव ्रती पर दु:ख आया देखकर दु:ख मेटने की इच्छा से, अपने को आये दु:ख के समान विशेष कंपायमान होना, भूत-व्रतों में अनुकम्पा है । पर के उपकार के लिये अपना आहार, वस्त्रादि देना वह दान है । संसार के अभाव के लिये वीतरागता में उद्यमी होने पर भी पूर्वोपार्जित कर्म के उदय से रागसहित होना, वह सरागता है । सरागी के छह काय के जीवों की हिंसा का त्याग और इन्द्रियों के विषयों में अनुराग का त्याग, वह सरागसंयम है और संयमासंयम तथा पराधीनपने से बन्दीगृहादि में भोगोपभोग का रुकना, वह अकामनिर्जरा है । अज्ञानी मिथ्यादृष्टियों का तप, वह बालतप है । निर्दोष क्रिया का आचरण, वह योग है, उसे ध्यान कहते हैं । शुभ परिणामों की भावनापूर्वक क्रोधादि कषायों का अभाव, वह क्षमा है । लोभ का त्याग, वह शौच है । ऐसे इन भूतव्रतों में अनुकम्पा और दान का देना सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा, बालतप, योग तथा क्षमा, शौच - इन रूप परिणाम वे सातावेदनीय के आस्रव के कारण हैं तथा अरहन्त भगवान की पूजा करने में तत्परता, बालवृद्ध-तपस्वियों की वैयावृत्त्य में उद्यम, सरल परिणाम, विनयादि सभी सातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं । दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव के कारणरूप परिणामों को कहते हैं । जिसे ज्ञानावरण कर्म के अत्यन्त क्षय से उत्पन्न केवलज्ञान, वह केवली है । राग-द्वेष-मोहरहित और बुद्धि के अतिशय से ऋद्धि से युक्त जो गणधर देव, उनके द्वारा प्रकाशा गया, वह श्रुत है । रत्नत्रय के धारक मुनीश्वरों का समूह, वह संघ है । अहिंसादि लक्षण धर्म है । भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी, कल्पवासी - ये चार प्रकार के देव हैं । केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव इनका अवर्णवाद करना, वह दर्शनमोह के आस्रव के कारण हैं । गुणवान महान पुरुषों का अनहोता/असत्य दोष, अपनी बुद्धि की मलिनता से प्रगट करना, वह अवर्णवाद है । जिसमें केवली के अन्न के पिण्ड का आहार करना तथा केवली कम्बल/ऊन के वस्त्र पहनते हैं । केवली निहार करते हैं । केवली के तुम्बी पात्र है । केवली के दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है - इत्यादि अपनी बुद्धि की मलिनता से समस्त दोष रहित केवली के झूठा दोष कहना, सो केवली का अवर्णवाद है । और ऐसा कहे - श्रुत/शास्त्र में मांसभक्षण, मच्छी-मच्छ का भक्षण तथा मधु/शहद का भक्षण, मदिरापान करना तथा कामपीडित साधु को मैथुनसेवन करना, रात्रिभोजन करना - इत्यादि को निर्दोष कहा है - ऐसा कहना, वह श्रुत का अवर्णवाद है । ये जैन के दिगम्बर मुनि शूद्र हैं, स्नानरहित हैं, मल से लिप्त हैं, अशुचि हैं, निर्लज्ज हैं, यहाँ ही प्रत्यक्ष दु:ख भोगते हैं तो परलोक में कैसे सुखी होंगे ? ऐसा कहना, वह संघ का अवर्णवाद है । जिनेन्द्र उपदिष्ट दशलक्षण धर्म निर्गुण है, इसके सेवन करने वाले असुर होंगे - ऐसा कहना, वह धर्म का अवर्णवाद है । देव मांसभक्षण करते हैं, मदिरा पीते हैं - इत्यादि कहना, वह देव का अवर्णवाद है । इसप्रकार केवली का अवर्णवाद, श्रुत का अवर्णवाद, संघ का अवर्णवाद, धर्म का अवर्णवाद, देव का अवर्णवाद - ये दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं । अब चारित्रमोहनीय कर्म के आस्रव के कारणरूप परिणामों को कहते हैं - जगत के उपकार करने में समर्थ जो शीलव्रत, उनकी निंदा करना, आत्मज्ञानी तपस्वियों की निन्दा करना, धर्म का विध्वंस करना, धर्म के साधनों में अन्तराय करना तथा शीलवान को शील से डिगाना/ चलायमान करना, देशव्रती को तथा महाव्रती को व्रतों से चलायमान करना, मद्य-मांस-मधु के त्यागियों के चित्त में भ्रम उत्पन्न करना, जिससे त्याग में शिथिल हो जायें, चारित्र में दूषण लगाना, क्लेशरूप लिंग-भेष धारण करना, क्लेशरूप व्रत धारण करना, अपने को और पर को कषाय उत्पन्न कराना - इत्यादि कषायवेदनीय के आस्रव के कारण हैं । कोई व्यक्ति अनेक प्रकार की क्रीडा करे, उसकी क्रीडा में तत्परता, दूसरों की क्रीडा की सामग्री का उद्यम करना, उचित क्रिया का वर्जन नहीं करना, अनेक प्रकार की पीडा का अभाव करना, देशादि में उत्सुकपने का अभाव, वह रतिवेदनीयकर्म के आस्रव का कारण है । अन्य जीवों से अरति प्रगट करना, पर की रति का विनाश करना, पापरूप जिनका स्वभाव है, उनकी संगति करना, अकल्याणरूप खोटी क्रियाओं में उत्साह रखना - ये अरति वेदनीयकर्म का आस्रव करते हैं । अपने को शोक हो, उसमें विषादी होकर चिंतवन करना, पर के दु:ख प्रगट करना, दूसरों को शोक में लीन देखकर आनंद मानना, वह शोक वेदनीय कर्म के आस्रव का कारण है । भयरूप अपना परिणाम करना, पर को भय उपजाना, निर्दयपने से पर को त्रास देना इत्यादि भयवेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं । सत्यधर्म को प्राप्त हुए चार वर्ण के धारक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - उनके कुल की क्रिया आचार की ग्लानि करना, पर का अपवाद करना, वह जुगुप्सावेदनीय के आस्रव का कारण है । अतिक्रोध के परिणाम, अतिमानीपना, ईर्ष्या का व्यवहार, असत्यवचन, अतिमायाचार में तत्परता, अतिरागभाव करना, परस्त्री सेवन करना, परस्त्री का रागभाव से आदर करना, स्त्री के समान भाव, आलिंगनादि करना - इन भावों से स्त्रीवेद कर्म का आस्रव होता है । अल्प क्रोध, कुटिलता का अभाव, विषयों में उत्सुकता का अभाव, निर्लोभता, स्त्री के संबंध में अल्प राग, अपनी स्त्री में संतोष, ईर्ष्या का अभाव, गन्ध, पुष्प, माल्य, आभरण में अनादर इत्यादि पुरुषवेद कर्म के आस्रव के कारण हैं । क्रोध, मान, माया, लोभ - चारों कषायों का प्रचुर परिणाम का होना तथा गुह्य इन्द्रियों का छेदना, स्त्री-पुरुषों के काम अंगों को छोडकर अनंग में व्यसनीपना, शीलवन्तों पर उपसर्ग करना, व्रतियों को दु:ख देना, गुणों के धारकों का मथन करना, दीक्षा को ग्रहण करने वालों को दु:ख देना, परस्त्री के संगम के लिए तीव्र राग करना, आचाररहित निराचारी होना, वह नपुंसकवेद के बन्ध का कारण है । चार प्रकार की आयु में नरक आयु के बन्ध का कारण कहते हैं । हिंसा के कारणभूत बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह का संचय करना, वह नरक आयु के आस्रव का कारण है । विशेष कहते हैं - मिथ्यादर्शन से मिथ्या आचरण, उत्कृष्ट अभिमानीपना, शिलाभेद सदृश क्रोध, तीव्र लोभ में अनुराग, निर्दयपना, पर जीवों को संताप उपजाने के परिणाम रखना, परघात के परिणाम रखना, पर के बन्धन का अभिप्राय, समस्त जीवों का घात करने का परिणाम रखना, जिससे प्राणियों का घात हो - ऐसा असत्यवचन का स्वभाव रखना, परद्रव्य के हरने के परिणाम, मैथुन का उपसेवन, पाप का कारण अभक्ष्य आहार, वैर की स्थिरता, यतियों की निंदा, तीर्थंकरों की अवज्ञा, कृष्ण लेश्या के परिणाम, रौद्रध्यान से मरण इत्यादि नरक आयु के आस्रव के कारण हैं । मायाचारी का परिणाम तिर्यंच योनि का कारण है । मिथ्या धर्म का उपदेश, बहु आरम्भ, बहुपरिग्रह, कपट, कूटकर्म करना, पृथ्वी के भेदसमान क्रोध, शील रहितपना, शब्द- चिः-वचनों से तीव्र मायाचार में प्रीति, पर के परिणामों में भेद/द्रोह पैदा करना, अनर्थ प्रगट करना, वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श इनको विपरीत कर देना; जाति, कुल, शील में दूषण लगाना, विसंवाद का अभिप्राय रखना, पर के उत्तम गुणों को छिपाना, नहीं होते हुए भी अवगुण प्रगट करना, नील, कापोत लेश्या के परिणाम, आर्तध्यान से मरण इत्यादि तिर्यंच आयु के आस्रव के कारण हैं । अल्प आरम्भ तथा अल्प परिग्रहपना मनुष्य आयु के आस्रव का कारण है । मथ्यादर्शनसहित बुद्धि, विनयवान स्वभावपना, सरल प्रवृत्ति, मार्दव, आर्जव, साँचे आचरण में सुख मानना, अपना सुख बताना, बालू-रेत में लीकसमान क्रोध, सरल व्यवहार में प्रवृत्ति, संतोष में रति, प्राणियों के घात से विरक्तता, खोटे कर्म से निवृत्त होना, आपके पास आने वालों से मिष्ट संभाषण, प्रकृति से ही मधुरता, लौकिक व्यवहार से उदासीनता, ईर्ष्यारहितपना, अल्प संक्लेशपना, देव-गुरु-अतिथि की पूजा, दान के लिए अपने द्रव्यों में विभाग करना, कापोत लेश्या के परिणाम, मरणकाल में धर्मध्यानीपना और स्वभाव ही से बिना सिखाये कोमलपना - ये मनुष्य आयु के आस्रव के कारण हैं । सरागसंयम, अकामनिर्जरा, अज्ञानतप - ये देवायु के आस्रव के कारण हैं । तथा कल्याण करने वाले मित्र का संबंध, धर्म के स्थान आयतनों की सेवा, सत्यार्थ धर्म का श्रवण, धर्म की महिमा जैसे हो तैसे करना, सम्यक्त्व धारण करना, प्रोषधोपवास करना, इनसे देव आयु का आस्रव होता है । तत्त्वज्ञान रहित मिथ्यादृष्टि का जो तप करना है, वह बालतप है । उस बालतप के धारक भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी देवों में तथा बारहवेंे स्वर्गपर्यंत स्वर्ग में या मनुष्य-तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं और पराधीन होकर क्षुधा-तृषा का निरोध, भोगना, बन्दीगृहादि में ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, मलधारण करना (स्नानादि के साधनों के अभाव में शरीर पर मल जम जाता है ।), दुर्वचनादि का आताप सहना, दीर्घकाल तक रोगधारण/रोगी रहना - ये अकामनिर्जरा के धारक व्यन्तर, मनुष्य, तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं और संक्लेशरहित होकर वृक्ष से पडने वाले, पर्वत से गिरने वाले, भोजन के त्याग में, जलप्रवेश करने में, अग्निप्रवेश करने में, विष-भक्षण में, धर्म के मानने वाले व्यन्तर तथा मनुष्य-तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं और शीलवान, व्रतवान, दयावान, जलरेखा-समान क्रोध के धारक, भोगभूमि में उपजनेवाले, व्यन्तरादि देवों में जन्म धारण करते हैं । सम्यग्दृष्टि भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी देवों में उत्पन्न नहीं होते, कल्पवासी देवों में ही उत्पन्न होते हैं । अशुभ नामकर्म के कारणों को कहते हैं - मन-वचन-काय की कुटिलता रखना, विसंवाद करना, इससे अशुभ नामकर्म का बन्ध होता है । अशुभ योगों का विशेष ऐसा जानना, मिथ्यादर्शन धरना, पर की पीठ पीछे झूठी बातें कहना, चित्त का अस्थिरपना, ताखडी/तराजू, बाँट, कुडा/पाँच किलो अनाज नापने के बर्तन को कुडा कहते हैं, उन्हें रखना । सुवर्ण, मणि रत्नादि सच्चे में खोटे मिलाना, झूठी-खोटी साक्षी देना, अंग-उपांग काटना, वर्ण-रस-गंध स्पर्श - इनकी विपरीतता करना, अनेक जीवों को दु:ख देनेवाले यंत्र - पींजरे बनवाना, कपट की प्रचुरता, पर की निन्दा, अपनी प्रशंसा करना, झूठ वचन बोलना, पर का द्रव्य ग्रहण करना, महान आरंभ के महान परिग्रह का मद करना, उज्ज्वल आभरण वस्त्र, उज्ज्वल भेष का मद करना, रूप का मद करना, कठोर निंद्य वचन, असत्य प्रलाप, क्रोध के वचन-धीठता के वचन कहना, सौभाग्य में उपयोग करना, वशीकरण के प्रयोग करना, पर जीवों को कौतुहल उत्पन्न कराना, आभरण पहरने में आदर से अनुराग करना, जिनमन्दिर में चन्दनादि गंध और पुष्पमाल्यादि धूप-दीपादि का चुराना, हास्य करना, ईंटों को पकाने के प्रयोग, दावाग्नि के प्रयोग करना, देव की प्रतिमा का विनाश/खंडित करना तथा प्रतिमा के स्थान जो मन्दिर उसका नाश/तोडना-फोडना, मनुष्यादि के बैठने-रहने के मकान को मल-मूत्रादि से बिगाड देना - खराब कर देना, बाग-बगीचे, वन का विनाश करना, क्रोध-मान-माया-लोभ का तीव्रपना, पापकर्म से आजीविका करना, इत्यादि से अशुभ नामकर्म का आस्रव होता है । और मन-वचन-काय की सरलता, पूर्व में कहे गये उनसे पलटे परिणाम, वे सभी शुभनाम कर्म के आस्रव के कारण हैं तथा धर्मात्मा को देखकर हर्ष को प्राप्त होना, सम्यग्भाव/ साम्यभाव रखना, संसार-भ्रमण से भयभीत रहना, प्रमाद वर्जना, इत्यादि शुभनामकर्म के आस्रव के कारण हैं ।
अब अनन्त और उपमारहित है प्रभाव जिसका, अचिंत्यविभूतिविशेष का कारण त्रैलोक्य में विजय करने वाले, ऐसे तीर्थंकर नामक नामकर्म के आस्रव की कारण षोडश- कारण भावनायें हैं । उनका संक्षेप में कथन इसप्रकार है -
  1. जिनेन्द्रकृत उपदिष्ट निर्ग्रन्थ लक्षणमोक्ष के मार्ग में रुचि और नि:शंकितत्वादि अष्ट अंगों की उज्ज्वलता रूप [[दर्शनविशुद्धि]] है
  2. ज्ञान-दर्शन-चारित्र में और दर्शन-ज्ञान-चारित्र के धारकों में आदर करना, सत्कार करना तथा कषाय का अभाव करना, वह [[विनयसम्पन्नता]] है
  3. अहिंसा आदि व्रतों में तथा व्रत को पालने के लिये अति क्रोध, मान, माया, लोभ का त्याग, स्वभाव शीलों में मन-वचन-काय से निर्दोष प्रवृत्ति करना, वह [[शीलव्रतेष्वनतीचार]] भावना है
  4. ज्ञान की भावना, पढना, पढाना, उपदेश देना इत्यादि श्रुतज्ञान के अर्थ में निरन्तर उपयोग रखना/लगाना, वह [[अभीक्ष्णज्ञानोपयोग]] है
  5. शरीर संबंधी दु:ख तथा मानसिक दु:ख, इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग, वांछित का अलाभ इत्यादि संसार दु:खों से सदा भयभीतता, वह [[संवेग भावना]] है
  6. धर्मात्मा पुरुषों के उपकार के लिये आहार, औषध, शास्त्र तथा अभय का दान सम्यग्भावों से भक्तिपूर्वक देना वह [[शक्तितस्त्याग]] है
  7. अपने वीर्य/शक्ति को छिपाये बिना जिनेन्द्र के मार्ग के अनुकूल अनशनादि कायक्लेश करना, वह
  8. शक्तितस्तप है
  9. मुनीश्वरों को किसी कारण से व्रत, तप, शील, संयम में विघ्न आवे, उनका विघ्न दूर करके रक्षा करना, जैसे अनेक वस्तुओं से भरे भण्डार में अग्नि लगी हो तो उसे बुझाना ही रक्षा है, तैसे ही साधुओं के विघ्न, दु:ख दूर करके तप, व्रत, शील, संयम की रक्षा करना, वह [[साधु समाधि]] है
  10. गुणवंतों को दु:ख प्राप्त होने पर निर्दोष विधि से उनका दु:ख दूर करना, टहल करना, वह [[वैयावृत्त्य]] है
  11. केवलियों के गुणों में अनुराग वह [[अर्हद्भक्ति]] है
  12. सम्पूर्ण संघ के अधिपति, दीक्षा-शिक्षा के दायक आचार्य के गुणों में अनुराग, वह [[आचार्यभक्ति]] है
  13. स्वमत-परमत के ज्ञाता ऐसे बहुश्रुतों के गुणों में अनुराग, वह [[बहुश्रुतभक्ति]] है
  14. श्रुतज्ञान के गुणों में अनुराग, वह [[प्रवचनभक्ति]] है
  15. षट् आवश्यकों का यथासमय प्रवर्तन करना, वह [[आवश्यकापरिहाणि]] नाम की भावना है
  16. ज्ञान के प्रकाश से, महान तप से एवं जिनपूजा से जिनधर्म का उद्योत करना, वह [[मार्गप्रभावना]] है
  17. धर्मात्मा पुरुषों में अतिस्नेह करना । जैसे गौ, वत्स में प्रीति करती है, तैसे प्रीति करना, वह [[प्रवचनवत्सलत्व]] है
ये षोडश भावनाएँ तीर्थंकर नामकर्म के आस्रव का कारण हैं ।
अब गोत्रकर्म के आस्रव के कारणों में नीचगोत्र नामकर्म के आस्रवों के कारणों को कहते हैं । पर में दोष हों या न हों, उन्हें प्रगट करने की इच्छा, वह परनिंदा है । अपने में विद्यमान या अविद्यमान गुणों को प्रगट करने की इच्छा, वह आत्मप्रशंसा है । पर के सत्य गुणों को भी आच्छादन करना/ढकना और अपने झूठे ही गुण प्रगट करना, वह परनिंदा आत्मप्रशंसा है । पर में गुण हों, उन्हें ढँकना और अपने अनहोते/नहीं होने वाले गुणों को प्रगट करना, वे नीच गोत्र के आस्रव के कारण हैं । विशेष ऐसा जानना - जाति, कुल, बल, रूप, श्रुत, आज्ञा, ऐश्वर्य, तप का मद करना, पर की अवज्ञा करना, पर का हास्य-हँसी करना, पर के अपवाद करने का स्वभाव रखना, धर्मात्मा पुरुषों की निंदा करना, अपनी उच्चता दिखाना, पर के यश को बिगाडना, असत्य/ झूठी कीर्ति उत्पन्न करना, गुरुजनों का तिरस्कार करना, गुरुओं का दोष जाहिर/विख्यात करना और गुरुजनों का स्थान बिगाडना, अपमान करना, गुरुओं को पीडा उपजाना, अवज्ञा करना, गुणों का लोप करना, गुरुओं को अंजुली/हाथ नहीं जोडना, गुरुओं की स्तुति नहीं करना, गुरुओं के गुणों को प्रकाशित नहीं करना, गुरुओं को आते देखकर खडे नहीं होना, तीर्थंकरादिकों की आज्ञादि का लोप करना । ये सभी नीचगोत्र के बंध के कारण हैं । उच्चगोत्र के आस्रव के कारणों को कहते हैं - अपनी निंदा करना, पर की प्रशंसा करना, पर के अच्छे गुणों को प्रगट करना, अवगुणों को ढँकना, गुणवंतों के प्रति विनयपूर्वक नम्रीभूत रहना, अपने में ज्ञानादि गुणों की अधिकता होने पर भी ज्ञानादिकृत मद को प्राप्त नहीं होना, अहंकार नहीं करना, वह उच्चगोत्र के आस्रव का कारण है । और भी कहते हैं - जाति, कुल, बल, रूप, वीर्य, विज्ञान, ऐश्वर्य, तप - इनकी अधिकता हो तो भी अपनी उच्चता का चिंतवन न करना, अन्य जीवों की अवज्ञा नहीं करना, अन्य जीवों से उद्धतपना छोडना, पर की निंदा, पर से ग्लानि, पर की हँसी, पर के अपवाद का त्याग करना और अभिमानरहित रहना, धर्मात्माजन की पूजा-सत्कार करना - देखते ही उठकर खडे होना, अंजुली जोडना, नम्रीभूत होना, वंदना करना, अभी/इस समय में अन्य पुरुषों को ऐसे गुणों का होना दुर्लभ है, वैसे गुण अपने में होने पर भी उद्धतपना नहीं करना, अहंकार का अभाव करना, जैसे भस्म में ढकी हुई अग्नि के समान अपना माहात्म्य नहीं प्रगट करना, धर्म के कारणों में परम हर्ष करना, वह सभी उच्च गोत्र के आस्रव के कारण हैं । अन्तराय कर्म के आस्रव के कारणरूप परिणामों को कहते हैं । दान देने में विघ्न करने से दानांतराय का आस्रव होता है । किसी को लाभ होता हो, उस लाभ के कारणों को बिगाड देना, उससे लाभांतराय कर्म का आस्रव होता है । पर के भोग बिगाडने से भोगांतराय का, पर के उपभोग बिगाडने से उपभोगांतराय का, पर का वीर्य-शक्ति बिगाडने से वीर्यांतराय कर्म का आस्रव होता है । इनका विस्तार कहते हैं । कोई ज्ञानाभ्यास करता हो, उसका निषेध करने से तथा किसी का सत्कार होता हो तो उसके नष्ट करने से तथा दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य, स्नान, विलेपन, इतर, सुगन्ध, पुष्पमाल्यादि, वस्त्र, आभरण, शय्या, आसन, भक्षण करने योग्य भक्ष्य, भोजन करने योग्य भोज्य, पीने योग्य पेय, आस्वादने योग्य लेह्य, इत्यादिक में विघ्न करने से तथा वैभव-समृद्धि देखकर आश्चर्य करने से, अपने द्रव्य/धनादि होते हुए नहीं खर्चने से, द्रव्य की तीव्र वांछा से देवताओं के चढी हुई वस्तु के ग्रहण करने से, निर्दोष उपकरण के त्यागने से, पर की शक्ति-वीर्य विनाशने से, धर्म का छेद करने से, सुन्दर आचार के धारक तपस्वी गुरु का घात करने से, जिन प्रतिमा की पूजा बिगाडने से तथा दीक्षित दरिद्री, दीन, अनाथ - इनको कोई वस्त्र, पात्र, स्थान देते हों, उनका निषेध करने से, पर को बन्दीगृह में बन्द करने से, बाँधने से, गुह्य अंगों को छेदने से, कर्ण-नासिका-ओष्ठों को काटने से, जीवों को मारने से अंतराय नामक कर्म का आस्रव होता है । जैसे कोई मद्यपानी अपनी रुचिविशेष से मद-मोह-विभ्रम को कराने वाली मदिरा पीकर और उसके उदय के/नशे के वश से अनेक रूप विकार को प्राप्त होता है तथा जैसे रोगी अपथ्य भोजन करके अनेक वात-पित्त-कफादि जनित विकारों को प्राप्त होता है, तैसे आस्रवविधि से ग्रहण किया गया अष्ट प्रकार ज्ञानावरणादि कर्म तथा एक सौ अडतालीस प्रकार उत्तर कर्म तथा असंख्यात लोक प्रमाण उत्तरोत्तर कर्म की प्रकृतियों से उत्पन्न विकार को प्राप्त होता है । कोई प्रश्न करता है कि आयुकर्म बिना सप्त कर्म प्रकृतियों का आस्रव प्रतिसमय निरंतर अनादिकाल से हो रहा है, तब तत्प्रदोषादि से ज्ञानावरणादि का ही नियम कैसे रहा ? उसका उत्तर - एक समय में जो समयप्रबद्ध आते हैं, उसके परमाणु ज्ञानावरणादि रूप सात कर्म में बँट जाते हैं तथा अपने-अपने हिस्से में से अपनी-अपनी उत्तरप्रकृतियों में यथायोग्य बँट जाते हैं; इसलिए समस्त कर्मप्रकृतियों के प्रदेशबंध के प्रति नियम नहीं कहा । जो ये पूर्व में तत्प्रदोषादिक भाव कहे, उनका अनुभाग के प्रति कारण का नियम है । इन भावों से जो कर्म आते हैं, उनका अनुभाग के लिए नियम जानना । जैसे - किसी पुरुष का भाव दान देने में विघ्न करने वाला हुआ, उस समय में जो कर्म का आस्रव हुआ, वह सात कर्म में बँट गया; परन्तु दानांतराय कर्म में तीव्र रस पडा, शेष प्रकृतियों में थोडा पडा । प्रकृति, स्थिति, प्रदेश - तीन प्रकार का बंध हुआ । अनुभाग, कषाय रूप भावों के प्रमाण किसी में तीव्र पडा, किसी में मन्द पडा - ऐसा जानना । यहाँ संक्षेप में ऐसा जानना - आस्रव सत्तावन प्रकार के हैं । मिथ्यात्व के पाँच प्रकार हैं - 1. एकान्त, 2. विपरीत, 3. विनय, 4. संशय, 5. अज्ञान । पाँच इन्द्रियाँ और मन को वशीभूत नहीं करना और छह काय जीवों की हिंसा का त्याग नहीं करना - ये बारह प्रकार की अविरति है । अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोधम ान-माया-लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभ, संज्वलन क्रोध-मान-मायालोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुसंकवेद - ये पच्चीस कषायें हैं । सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, उभयमनोयोग, अनुभयमनोयोग - ये चार मन के योग हैं । सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग, अनुभयवचनयोग - ये चार वचनयोग हैं । औदारिक, औदारिकमिश्र, वैक्रियिक, वैक्रियिकमिश्र, आहारक-आहारकमिश्र, कार्माण - ये सात काय योग हैं । ऐसे मिथ्यात्व पाँच, अविरति बारह, कषाय पच्चीस, योग पन्द्रह - ये सत्तावन आस्रव हैं । कर्म इनके द्वारा/माध्यम से आते हैं । उनमें से मिथ्यात्व के कारण कर्म एक मिथ्यात्व गुणस्थान में ही आते हैं, अविरत के कारण कर्म देशसंयम पर्यंत ही आते हैं । उनमें भी त्रसवध के कारण कर्म चार गुणस्थान पर्यंत ही आते हैं । कषाय के द्वार से कर्म सूक्ष्मसाम्परायपर्यंत/दशवें गुणस्थानपर्यंत आते हैं और योग के कारण कर्म तेरहवें गुणस्थान पर्यंत आते हैं । इसप्रकार आस्रव भावना का संक्षेप में वर्णन किया । विस्तार से गोम्मट्टसार नामक ग्रन्थ से जान लेना ।

  सदासुखदासजी