
मिच्छत्तासवदारं रुंभइ सम्मत्तदिढकवाडेण ।
हिंसादिदुवाराणिवि दढवदफलहेहिं रुंभंति॥1842॥
समकितरूपी दृढ़ कपाट से बन्द होय मिथ्यास्रव द्वार ।
दृढ़ व्रत साँकल से रुकते हैं हिंसादिक आस्रव के द्वार॥1842॥
अन्वयार्थ : सम्यक्त्वरूप दृढ कपाट से मिथ्यात्वरूप आस्रवद्वार को रोकता हैऔर दृढव्रत रूप अर्गला से हिंसादि द्वारों को रोकता है । मिथ्यात्व और अव्रत द्वारा कर्म आते थे, उसका संवर होता है ।
सदासुखदासजी