
उवसमदयादमाउहकमरेण रक्खा कसायचोरेहिं ।
सक्का काउं आउहकरेण रक्खाव चोराणं॥1843॥
यथा हस्तगत आयुध द्वारा चोरों से होती रक्षा ।
उपशम दया दमादिक भावों से कषाय से हो रक्षा॥1843॥
अन्वयार्थ : कषायों का उपशम जीवोें की दया और इन्द्रियों का दमन - ये ही आयुध हैंहाथ में जिसके, वे पुरुष कषायरूपी चोरों से अपनी रक्षा करते हैं । जैसे जिसके हाथ में आयुध है, वह पुरुषरूपी चोरों से रक्षा करने में समर्थ होता है ।
सदासुखदासजी