
इंदियदुद्दन्तस्सा णिग्घिप्पंति दमणाणखलिणेहिं ।
उप्पहगामी णिग्घिप्पंति हु खलिणेहिं जह तुरया॥1844॥
ज्यों कुमार्गगामी घोड़ों को दृढ़ लगाम से वश करते ।
इन्द्रिय दम युत ज्ञान करे दुर्दम इन्द्रिय तुरंग वश में॥1844॥
अन्वयार्थ : जैसे उत्पथ मार्ग में गमन करने वाले घोडे को लगाम से निग्रह/रोक/काबू में कर सकते हैं, तैसे इन्द्रियरूप दुष्ट घोडों को विषयों से रोकने रूप लगाम से काबू में कर सकते हैं ।
सदासुखदासजी